इसरो की बर्बादी की पटकथा 2023 में मोदी सरकार ने फाइनल कर दी थी। लिखी तो यह 2018 से जा रही थी।
देश की गौरवगाथा के स्वर्णिम अध्याय इसरो को अब मित्रों के बीच ‘कद्दू कटेगा तो सब में बंटेगा’ की तर्ज पर निपटाया जा रहा है।
इसरो की सबसे बड़ी पूंजी उसकी बौद्धिक संपदा और वैज्ञानिक हैं। इसे ही लुटवाया जा रहा है और यह लूट देश के लिए राम मंदिर की लूट से भी ज्यादा गंभीर लूट है।
120 वैज्ञानिक इसरो को अलविदा कह गए हैं, क्यों?
क्या मोदी सरकार ने ही पूरे सुनियोजित तरीके से नीति बनाकर उन्हें इस रास्ते पर धकेला है?
ISRO में निजी क्षेत्र की भागीदारी और बड़े पैमाने पर आउटसोर्सिंग को औपचारिक रूप देने के लिए वर्ष 2023 में मोदी सरकार भारतीय अंतरिक्ष नीति लाई। इसका उद्देश्य था इसरो की बौद्धिक संपदा में मित्रों के लिए सेंधमारी का रास्ता बनाना।
इस नीति में तय किया गया कि इसरो अब ऑपरेशनल स्पेस सिस्टम, रॉकेट निर्माण और सैटेलाइट असेंबलिंग जैसे कामों को पूरी तरह निजी कंपनियों और स्टार्टअप्स को आउटसोर्स करेगा। लेकिन इन निजी कंपनियों को इस काम के लिए ऐसे वैज्ञानिक चाहिए थे, जो इसरो की जरूरतों और कामकाज को समझते हों।
इस नीति के फलस्वरूप आज अडानी ग्रुप एक बड़ी एयरोस्पेस कॉर्पोरेट इकाई के रूप में इसरो के साथ उपग्रह असेंबलिंग, कलपुर्जे बनाने और रॉकेट तकनीक के कमर्शियलाइजेशन में बड़ी भूमिका निभा रहा है। अडानी समूह अपनी रक्षा और अंतरिक्ष इकाई Adani Defence & Aerospace और अधिग्रहित की गई कंपनियों के माध्यम से इसरो के बड़े आउटसोर्सिंग प्रोजेक्ट्स और सैटेलाइट निर्माण से गहराई से जुड़ा हुआ है।
बेंगलुरु स्थित अल्फा डिजाइन टेक्नोलॉजीज को अडानी डिफेंस सिस्टम्स एंड टेक्नोलॉजीज लिमिटेड ने 2019 तक अधिग्रहित कर लिया था। आज यह इसरो के सबसे प्रमुख निजी भागीदारों में से एक है। यानी नीति आने से पांच साल पहले ही मित्र ने लाभ उठाने की तैयारी शुरू कर दी थी।
इस कंपनी के नेतृत्व वाले कंसोर्टियम ने इसरो के Earth Observation Satellite (EOS-04) या ‘Risat-1A’ को पूरी तरह से असेंबल, इंटीग्रेट और टेस्ट (AIT) किया।
इसरो के ‘वर्कहॉर्स’ कहे जाने वाले PSLV रॉकेट के निर्माण को पूरी तरह निजी हाथों में आउटसोर्स करने के लिए इसरो की वाणिज्यिक शाखा (NSIL) से बोलियां आमंत्रित करवाई गई थीं। इस दौड़ में भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (BEL) और भारत अर्थ मूवर्स लिमिटेड (BEML) के साथ मिलकर अडानी एंटरप्राइजेस लिमिटेड (AEL) ने एक बड़ा कंसोर्टियम बनाया, जो इसरो के रॉकेट आउटसोर्सिंग प्रोजेक्ट में सक्रिय रूप से शामिल है।
अब करते हैं अन्य कंपनियों की बात। वर्ष 2023 में इसरो में सेंधमारी के लिए आई नई नीति से 400 से अधिक निजी स्पेस टेक स्टार्टअप पैदा हुए हैं।
स्काईरूट एयरोस्पेस इसरो के साथ समझौता करने वाला पहला प्रमुख निजी स्टार्टअप है। यह ‘विक्रम’ सीरीज के लॉन्च वाहनों (रॉकेट) का निर्माण कर रहा है।
इसकी स्थापना इसरो के ही दो पूर्व वैज्ञानिकों पवन कुमार चांदना और नागा भारत डाका ने 2018 में की थी। यानी उन्हें और उनके निवेशकों को पांच साल पहले से ही भनक थी कि इसरो का कद्दू कटेगा। इस स्टार्टअप में देश ही नहीं विदेश से भी निवेश हुआ। निवेशकों में सिंगापुर का सॉवरेन वेल्थ फंड, टेमासेक, दुनिया के सबसे बड़े एसेट मैनेजर्स में से एक ब्लैकरॉक, गूगल और व्हाट्स ऐप से जुड़े रहे अधिकारी भी शामिल हैं।
अग्निकुल कॉस्मोस स्टार्टअप 3D-प्रिंटेड रॉकेट इंजन और छोटे उपग्रहों को लॉन्च करने के लिए वाहन बना रहा है। इस स्टार्टअप को आईआईटी मद्रास के होनहारों ने 2017 में शुरू कर दिया था।
इसरो संपदा पर मंडरा रहीं ऐसी अन्य कंपनियों में अनंत टेक्नोलॉजीज, पिक्सेल, ध्रुव स्पेस, गेलेक्साई जैसे करीब छोटे-बड़े 400 स्टार्टअप और कंपनियां हैं। सबकी कहानी कहने बैठे तो पोस्ट नहीं पूरी किताब लिखनी पड़ेगी।
इन सभी निजी कंपनियों को वैज्ञानिक चाहिए और वैज्ञानिक पेड़ पर नहीं लगते। वे इसरो से उठाने पड़ेंगे। सरकार भी जानती है कि वैज्ञानिक देशभक्त हैं। ऐसे नहीं जाएंगे। उन्हें इसरो छोड़ने के लिए परेशान करना पड़ेगा। उनके प्रोजेक्ट लटकाने पड़ेंगे। फंड अटकाने पड़ेंगे।
आपको याद होगा कि जब चंद्रयान -3 की सफलता की खबर आई थी, तब मीडिया के एक कौने में यह भी खबर छपी थी कि इस अभियान के लिए जरूरी कलपुर्जे बनाने वाले सरकारी उपक्रम हैवी इंजीनियरिंग कॉर्पोरेशन लिमिटेड के इंजीनियरों और कर्मचारियों का वेतन सरकार कई महीने से रोके हुए थी। अगर नेता की नियत साफ़ न हो तो बहुत हथकंडे होते हैं।











