बहुत समय बाद ऐसा हुआ कि प्रधानमंत्री का संबोधन था और उनके अपने पेज पर देखने वालों की सख्या अधिकतर समय लाख से भी नीचे रही। ट्विटर पर एक बार जरूर संख्या 1.37 लाख के आसपास पहुंची जब भाषण खत्म होने में १०-१२ मिनिट बचे थे। भाजपा के पेज पर तो यह संख्या ढाई हज़ार भी मुश्किल से पहुँच रही थी।
मोदी एक कल्ट के रूप में उभरे लेकिन 2019 के बाद जादू में कमी आने लगी। मध्यम वर्ग जो उनके साथ जुड़ा था, उस वर्ग को भी सबसे ज़्यादा कष्ट हुआ। राम मंदिर बनने के बाद जब सब 400 का आंकड़ा बता रहे थे, मैंने अपने पंचायती चैनल पर संदेह जताया था और पहले चरण के चुनाव के बाद मेरी गणित 245 सीट के आसपास की थी। (वीडियो वहीं है।) तब भी बहुत से समर्थक और विरोधी दोनों ही आंकड़ों के विरोध में थे। मोदी भक्त क्यों विरोध में थे, आप समझ सकते हैं और राहुल गांधी के नए समर्थक तो वोटिंग पैटर्न और लोक व्यवहार के लॉजिक को उतना ही समझते हैं जितना तमिलनाडु के लोग हिंदी।
खैर, एक बात तय है कि मोदी अब अगले लोकसभा चुनाव में कोई जादू नहीं पैदा कर सकते। उनकी उम्मीदें अब भी राहुल गांधी की मूर्खताएं ही है जो वह बीच बीच में करते रहते हैं लेकिन यह भी ध्यान देना चाहिये कि इन मूर्खताओं में (ख़ासकर गंभीर किस्म की) बहुत ज़्यादा कमी आई है जिनपर भाजपा खेलती थी। इसलिये इस बार संभावना यही रहेगी कि कांग्रेस और राहुल गांधी पर किये जाने वाले हमले कारगर नहीं होंगे। बावजूद इसके भाजपा की उम्मीद अब भी राहुल गांधी ही हैं। राहुल गांधी के समर्थक यह बात उसी तरह नहीं मानेंगे जिस तरह तरह मोदी समर्थक जादू ख़त्म होने वाली बात नहीं मानेंगे।
भाजपा की एक और उम्मीद मुसलमान है। यह मसला भी ख़त्म होने लगा था लेकिन ईरान मसले में लोगों ने जिस तरह भारत के मुसलमानों को देखा, अंदर अंदर फिर से वही बातें उठने लगी जो दबने लगी थी। आपस की बातों में यह बात होती है कि अमेरिका की दादागिरी का विरोध करने के लिये ईरान के तानाशाह का समर्थन कितना जरूरी था? तो अगले तीन साल में राहुल गांधी और मुसलमान भाजपा के निशाने पर रहेंगे कि एक चूक हो और फिर पुराना खेल शुरू हो।
हालांकि मेरा अब भी मानना है कि भाजपा के तरकश के ये दोनों तीर अब बुझ चुके हैं जब तक कि कुछ इतना बड़ा न हो जाए कि मध्यम वर्ग अपने कष्ट भूल जाए. सवर्णों के साथ भाजपा ने जो किया है उसका अंडरकरेंट भी दिखेगा।
भाजपा की एक बड़ी दिक़्क़त उसकी अपनी वही टीम हो चुकी जो अब तक उसे सबसे आगे बढ़ा रही थी। कॉर्पोरेट में प्रायः एक समय बाद लोग इसलिए हटा दिये जाते हैं क्योंकि वो अति आत्मविश्वासी और आलसी हो जाते हैं और नया नहीं सोच पाते। कल मोदी का भाषण देखने वालों की संख्या में कमी यही बताती है कि मोदी जी का भाषण हर किसी को पहले से पता था कि क्या होगा, क्या बोलेंगे। पिछले २ वर्षों में भाजपा का सोशल मीडिया नैरेटिव विपक्षियों के नैरेटिव से पिछड़ता जा रहा है।
भाजपा कल कांग्रेस को महिला रिजर्वेशन बिल का विरोधी बताती रही लेकिन कांग्रेस यह समझाने में सफल हो गई कि यह महिला रिजर्वेशन बिल का मसला है ही नहीं क्योंकि वह पहले ही पास हो चुका। भाजपा अब तक यह नहीं समझा पाई है कि वह संशोधन क्या लायी थी और उससे कैसे महिला आरक्षण समय से पहले आता।
यह कमी उसी टीम की है जो अब तक नैरेटिव बनाती रही। सोचिये कि हर बार मोदी जी के काफिले में एम्बुलेंस लाने का आईडिया देने वाला कितना कामचोर होगा। लोग एक बार इसे चांस समझेंगे, दो बार समझेंगे, हर बार थोड़ी।
भाजपा नेतृत्व जानता है कि आज चुनाव हो जाए तो वह 200 सीट भी नहीं जीत पाएंगे और यही स्थिति रही तो 2029 तक मामला 25-30 सीट नीचे और खिसकेगा। इसमें पूरा योगदान शाह की टीम का होगा जो उत्तर प्रदेश में योगी को हिलाने में, बिहार में एक गुंडे को, राजस्थान और दिल्ली में अयोग्य को मुख्यमंत्री बनाने में लगी रही। शाह अंदर अंदर अपने समर्थक तैयार करना चाहते हैं लेकिन जनता उन्हें प्रधानमंत्री तो नहीं देख रही।
यही कारण है कि भाजपा महिला आरक्षण के बहाने परिसीमन के प्रस्ताव को पारित करवा लेना चाहती थी क्योंकि सीटें बढ़ने पर उसकी जीत सुनिश्चित है। परिसीमन सत्ता में बैठी पार्टी अपना लाभ देखकर करवाती है, इसके अलावा बूथ स्तर पर अब भी भाजपा मजबूत है इसलिये नई सीटें वह आसानी से जीत लेती। कांग्रेस के पास अभी न टीम है न इतने प्रत्याशी। अब जब यह खेल बिगड़ चुका तो भाजपा को नई रणनीति अपनाने की जरूरत पड़ चुकी है।
ये सब कहने के बावजूद कांग्रेस अगर यह सोच कर बैठी है कि अब २०२९ उनकी झोली में गिरेगा, तो वो होने से रहा. क्योंकि भाजपा के पास एक थिंक टैंक है जो उसी के विचार का है और वह यदि पूरी ताक़त से लगा तो बदलाव कर देगा. कांग्रेस और उसमें भी ख़ासकर राहुल गांधी का थिंकटैंक ऐसे लोगों से भरा है जिनका जमीनी जुड़ाव नहीं। वामपंथी लोग भाजपा में भी घुस गए और उनका नुक़सान कर रहे हैं तो राहुल गांधी के आसपास के वामपंथी उन्हें कहाँ जीतने देंगे. सवर्णों की भाजपा से नाराजगी का लाभ कांग्रेस उठा सकती है लेकिन वामपंथी उसे बर्बाद कर देंगे।
हाँ, ये लॉजिक अभी कोई देगा कि बंगाल के बाद असली फ़ैसला होगा तो वह निहायत बकवास लॉजिक है क्योंकि देश की जानता विधानसभा और लोकसभा का फ़र्क़ जानती है और दोनों जगह वैसे ही फैसला लेती है. देश की जनता की मानसिकता को ये स्वघोषित बुद्धिजीवी समझते तो चुनाव से पहले ही जान जाते कि बिहार में भाजपा को ज़्यादा सीटें आयेंगी।
कुल मिलाकर अभी दोनों ही पार्टियों की हालत तो टाइट है. देखिये क्या होता है।
– नवीन चौधरी(लेखक)












