जिला ब्यूरो/मनोज सिंह
टीकमगढ़/जतारा। वन विभाग में गंभीर अनियमितता और संदिग्ध कार्यप्रणाली का बड़ा मामला सामने आया है। जतारा वनपरिक्षेत्र के वनक्षेत्रपाल शिशुपाल अहिरवार को 12 वन अपराध प्रकरणों में नियमों की अनदेखी, जब्त वाहनों की जानकारी छिपाने, शासन को राजस्व हानि पहुंचाने और मनमानी कार्रवाई के आरोप में तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया है।
मुख्य वन संरक्षक, छतरपुर वृत्त द्वारा 22 अप्रैल 2026 को जारी आदेश में साफ कहा गया है कि वर्ष 2023 से 2024 के बीच जतारा परिक्षेत्र में अवैध उत्खनन, अवैध परिवहन और वन अधिनियम 1927 के तहत दर्ज 12 प्रकरणों में जब्त ट्रैक्टर, ट्रक, मिनी ट्रक, जेसीबी और अन्य वाहनों को नियमानुसार उपवनमंडलाधिकारी को सूचना भेजे बिना सीधे न्यायालय में पेश कर दिया गया।
आदेश के अनुसार यह पूरी कार्रवाई विभागीय प्रक्रिया को दरकिनार कर की गई, जिससे शासन को राजस्व हानि हुई और अपराधियों को राहत मिली। आरोप है कि प्रकरणों को जानबूझकर कमजोर बनाकर अभियुक्तों को लाभ पहुंचाने की कोशिश की गई।
जांच में यह भी सामने आया कि अप्रैल 2022 से दिसंबर 2023 तक की एफओसीआर पंजी समय पर प्रस्तुत नहीं की गई। इससे विभागीय निगरानी प्रभावित हुई और पूरे मामले पर गंभीर संदेह खड़ा हो गया।
17 दिसंबर 2025 को इस मामले में आरोप पत्र जारी किया गया था। शिकायतों और जांच प्रतिवेदन के आधार पर उपवनमंडलाधिकारी छतरपुर ने शिशुपाल अहिरवार को प्रथम दृष्टया दोषी माना।
मामले में एक और गंभीर तथ्य सामने आया कि निलंबित सहायक ग्रेड-3 सुरेश प्रसाद अहिरवार को न्यायालय के अंतिम निर्णय से पहले ही वन परिक्षेत्र जतारा में कार्य करने की अनुमति दी गई। इसे वरिष्ठ अधिकारियों के अधिकारों का खुला उल्लंघन और गंभीर अनुशासनहीनता माना गया।
विभाग ने आरोपों की गंभीरता को देखते हुए मध्यप्रदेश सिविल सेवा नियम 1966 के तहत शिशुपाल अहिरवार को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है। निलंबन अवधि में मुख्यालय वनमंडल उत्तर पन्ना तय किया गया है।
वन विभाग की इस कार्रवाई ने कई पुराने सवाल फिर खड़े कर दिए हैं—क्या यह सिर्फ एक अधिकारी की मनमानी थी, या फिर पूरे तंत्र में लंबे समय से खेल चल रहा था? जंगल बचाने की जिम्मेदारी जिन पर थी, वही यदि नियमों का गला घोंटने लगें, तो जवाबदेही तय होना जरूरी है।











