सुबह की खबर ये थी कि अचानक दिल्ली पुलिस का काफिला आया और सुनियोजित – नाटकीय तरीके से सफेद चादर ओढ़ कर, एक दीवार बनकर मंच पर चढ़ गए। चारों तरफ़ से घेर कर मंच पर कब्जा जमा लिया और 20 दिन से भूख हड़ताल पर बैठे सोनम वांगचुक को एम्बुलेंस में बिठा कर सफ़दरजंग हॉस्पिटल ले गए। भले आज पुलिस की कार्यवाही नाटकीय लग रही थी, लेकिन इसकी रिहर्सल कुछ दिनों पहले से चल रही थी। कल शाम को मैं जंतर मंतर के धरना स्थल पर गया था और अंदर जिस तरह पुलिस वाले थे, अंदाजा लग रहा था। कल का मुख्य नारा 20 तारीख को संसद चलने को था। पूरा धरना स्थल भरा हुआ था। छात्रों की संख्या तो थी ही, पुलिस भी छितराए हुए थे। मुख्य धरना स्थल पर सोनम वांगचुक थे। वहाँ से लगातार भाषण और नारा चल रहा था। युवाओं में बहुत उत्साह दिख रहा था। पूरा धरना स्थल छोटे – छोटे टुकड़ों में बँटा हुआ था और हर ग्रुप में कुछ न कुछ गतिविधियां चल रही थी, कहीं भाषण हो रहे थे तो कहीं नारे। एसएफआई, एआईएसएफआई , दिशा और आइसा के छात्रों के टेंट और पोस्टर लहरा रहे थे। कई युवा ज़मीन पर बैठे हुए पोस्टर बना रहे थे। दलित छात्रों का भी एक घेरा दिखाई दिया जो ब्राह्मणवाद, फासीवाद के विरुद्ध नारे लगा रहे थे। कोई बिस्कुट बांट रहा था तो कोई पानी पिला रहा था। दर्जनों यूट्यूबर लोगों से बात करते हुए दिख रहे थे। पूरा धरना स्थल भगत सिंह की तस्वीरों और इनके उद्धरणों से भरा हुआ था। जब मैं घूम रहा था तो ‘अस्मिता‘ थिएटर ग्रुप के कुछ अभिनेता भी मिल गए। वे भी उन्हीं के बीच डफली बजा रहे थे। मुझे खुशी हुई उनसे मिलकर, अभी भी थिएटर के लोग अपने को राजनीति से अलग समझते हैं। जब की तय है बिना राजनीति के संस्कृति कर्म संभव नहीं है, राजनीति का अर्थ बहुत लोग राजनीतिक दल से जोड़ लेते हैं।
कल मौसम में बहुत उमस थी। शरीर से पसीना हर हरा कर बह रहा था, मुख्य मंच के पास मैं खड़ा था तो देखा, सोनम वांगचुक के सिरहाने छोटा सा टेबल फैन था। भीड़ में बहुत गर्मी थी बहुतेरों के पास छोटे – छोटे पंखे थे। जिससे अपने को तो हवा कर ही रहे थे, दूसरों को भी हवा कर रहे थे। मेरे पीछे एक युवा खड़ा था, वो लगातार मुझ पर हवा कर रहा था। आंदोलन में यह सहभागिता मुझे अच्छी लगी। इसी तरह सब एक दूसरे को अपने हैंड फैन से हवा कर रहे थे और इस आंदोलन से ख़ुद को जोड़ रहे थे।
जितनी देर रहा, अपने को इस आंदोलन से जुड़ा हुआ महसूस कर रहा था। मुझे लग रहा था, भले मेरा बेटा यहाँ नहीं है, मैं अपने बेटे के हिस्से की लड़ाई लड़ रहा हूँ। कोई कहीं भी हो, लड़ाईं लड़नी चाहिए। ये एक लंबी लड़ाई है और केवल एक व्यक्ति के इस्तीफे की नहीं, पूरी इमारत को हिलाने की है, इसमें सबके सहयोग की जरूरत है।












