Ganesh Chaturthi Special: “मोदक प्रिय मृद मंगल दाता, विद्या बारिधि बुद्धि विधाता।’
बार-बार ये पंक्तियां मन में दोहराता हूँ। एक बेचैन दिल सुक़ून की तरफ बढ़ता चला जाता है। गणेशजी पर लिखी ये पंक्तियां बहुत कुछ कह रही हैं। यह जो श्री गणेश हैं, यह जीवन में मंगल लाने वाले हैं। मगर कैसा मंगल,क्या सिर्फ मेरे जीवन में सुख आए या फिर दूसरों की ज़िन्दगी के सुख,शांति और समृद्धि को हमें देखना है ।
मेरे सामने गणेशजी के बहुत से किस्से दौड़ रहे हैं। हर किस्से में जो खास है, वह है- न्याय के लिए उनका खड़े रहना, कर्तव्य के लिए टूटकर भी डटे रहना, मां के आदेश को दुनिया में हर चीज से ऊपर रखना। सारी बाधाओं के बावजूद हमेशा मुस्कुराते रहना। एक तरह से हम कह सकते हैं कि गणेश दुनिया के इस भूभाग के रोल मॉडल हैं, जिनकी बातें और जिनकी कहानियां लोगों को जीवन में उतारने की कोशिश करनी चाहिए। कभी उनकी तस्वीर में झांकिए, एक अलग सी मुस्कान दिखेगी। वह अमिट, अटूट धैर्य, जिसकी तुलना किसी लोक में संभव नहीं है। सिर कटने के बावजूद, जो न काटने वाले से दुखी होता है और न ही विचलित होता है । बल्कि मुस्कुराता हुआ खड़ा रहता है, ऐसा विशाल हृदय भला किसका हो सकता है?
एक बार उनकी जिंदगी में झांकिए। एक ऐसा चरित्र, जिसने सिर्फ हाथ उठाकर हर एक के मंगल की कामना की है। जो प्रकृति का पर्याय हो,रिद्धि-सिद्धि का हमसफ़र हो,हवा पानी का दोस्त हो,जो माफ़ करना सिखाए, जो दूसरों की मंगलकामना का पाठ पढ़ाए । हम तो उनके मानने वाले लोग हैं। चरित्र की इस दीवानगी में ही तो हम सारे फर्क मिटाकर जश्न मनाते हैं। ध्यान सिर्फ यह रखना है कि उनके चरित्र की बूंद भर भी अगर हममें आ गई तो यह जश्न सफल है। उनके जितना न सही, मगर जरा भी धैर्य आ गया तो बहुत कुछ बदल जाएगा। न्याय और कर्तव्य के लिए जूझना आ गया तो धरती मुस्कुराएगी। प्राणी मात्र के मंगल की कामना की भावना आ गई तो यह हृदय सागर जितना विशाल और हिमालय जितना ऊंचा होगा।
तिलक ने गणेश चतुर्थी की एक शुरआत की,आख़िर क्यों गणेश जैसा चरित्र ही चुना,त्यौहार तो और भी हो सकते थे । वह जानते थे कि उस चरित्र के पीछे चलो,जो चरित्र की विशालता,बराबरी,ज्ञान,बुद्धि और विवेक का इस्तेमाल सिखाए । पृथ्वी के चक्कर लगाने में गणेश जी का ही विवेक और बुद्धि थी,जिसने कार्तिक को पराजित किया और नियम सामने रखा कि शक्ति की परीक्षा बुद्धि से है, बल से नही है । बल का सही इस्तेमाल ही बुद्धि का काम है । जब कोई बुद्धि जी वि यों पर हंसता है, उन्हें नीचा दिखाता है, उनका मज़ाक उड़ाता है, तब मुझे दुःख होता है कि देखो,यह दुनिया के महान बुद्धि जी वी एकदंत गणेश जी की शिक्षा से कितनी दूर है ।
मैं अपनी भूमि के चरित्रों को धर्म से ज़्यादा संस्कृति की दृष्टि से देखता हूँ। यह संस्कृति को समृद्ध करते हैं, सींचते हैं और धर्म से संस्कृति के भेद को बतलाते हैं, मगर कौन कहे,कौन सोचे ।
यहां के त्योहारों को गौर से देखने, उसमें छिपे चरित्रों में झांकने, लाभ हानि के विरुद्ध शून्य में रहकर सोचने से बहुत संदेश ग्रहण कर सकते हैं। हर चरित्र एक ऐसा संदेश देकर जा रहा है। हमसे गलती हो रही है कि जश्न की आवाज में उस चरित्र की पुकार को सुन नहीं पा रहे हैं। उनके चेहरे पर बिखरे सुकून को तो देख रहे हैं, मगर खुद की जिंदगी में उतार नहीं पा रहे। गणेश जी की कथा सुनते हुए बड़े तो हो गए, मगर उसमें छिपे मर्म को नहीं समझ सके। मां पार्वती के लिए जिंदगी को दांव पर लगाने वाले पुत्र की जिंदगी की सबसे बड़ी सीख से खुद को दूर किए हुए हैं।
हो सके तो धर्म, जाति, सोच सबसे ऊपर उठकर एक ऐसा चरित्र गढ़िए जो हमारे गणेश के करीब हो। कल जब कंधे पर गणेश हों, हाथ में मोदक हो तब हृदय और आत्मा में उनका चरित्र भी होना चाहिए। खुद के लिए प्रसाद लेने के स्थान पर हर एक को प्रसाद देने वाले हृदय का निर्माण कीजिए।
गणेश चतुर्थी हमे जोड़ने का सन्देश देती है, उस ओर बढ़िए..महाराष्ट्र भूमि से उठकर,देशभर में फैल चुकी गणेश चतुर्थी की आप सबको बहुत बहुत बधाई,आप सबका मंगल हो…
– हाफिज किदवई (लेखक)