प्रयागराज में UPPSC परीक्षाओं को लेकर छात्रों का विरोध बढ़ता जा रहा है। छात्रों की प्रमुख मांग है कि PCS और RO-ARO जैसी परीक्षाएं एक ही दिन और एक ही शिफ्ट में कराई जाएं, ताकि सभी छात्रों के लिए निष्पक्षता और समानता सुनिश्चित हो सके। लेकिन आयोग का रुख कुछ और ही है। उनका कहना है कि परीक्षा की शुद्धता और पारदर्शिता बनाए रखने के लिए अलग-अलग शिफ्टों में परीक्षा आयोजित की जा रही है और केवल भरोसेमंद केंद्रों का चयन किया गया है।
अब सवाल यह उठता है कि क्या आयोग की इस नीति से वास्तव में छात्रों का भला हो रहा है, या फिर यह केवल एक बहाना बन गया है? छात्रों की वास्तविक समस्याओं को समझे बिना ऐसे फैसले लेना न केवल उनकी मेहनत का अपमान है, बल्कि उनके भविष्य के साथ खिलवाड़ भी है। दरअसल, आयोग का “नॉर्मलाइजेशन” का तर्क भी छात्रों के लिए पूरी तरह लाभकारी नहीं है। छात्रों का मानना है कि अलग-अलग शिफ्टों में परीक्षा कराने से एकरूपता का अभाव रहता है और नॉर्मलाइजेशन प्रक्रिया पूरी तरह से निष्पक्ष नहीं है। यह उन छात्रों के स्कोर पर नकारात्मक प्रभाव डालता है, जो पहले या बाद में परीक्षा देते हैं।
छात्र इस बात से भी परेशान हैं कि परीक्षा केंद्र दूरदराज के क्षेत्रों में रखे गए हैं, जिससे यात्रा का खर्च और समय दोनों का नुकसान होता है। परीक्षा देने के लिए लंबी दूरी तय करना, अतिरिक्त तनाव और खर्च का कारण बनता है। यही नहीं, इन केंद्रों पर पहुंचना भी सभी छात्रों के लिए मुमकिन नहीं है। ऐसे में छात्रों का विरोध करना वाजिब है, क्योंकि उनकी समस्याएं असली हैं, जिन्हें आयोग नजरअंदाज कर रहा है।
जिस तरह से आयोग ने यह तय कर लिया है कि परीक्षा का आयोजन अलग-अलग शिफ्ट्स में ही होगा, यह छात्रों की आवाज दबाने जैसा है। आयोग यह समझने में नाकाम रहा है कि जो छात्र दिन-रात मेहनत करते हैं, वे परीक्षा में निष्पक्षता की उम्मीद रखते हैं। यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि जिन छात्रों को किताबों में खोए रहना चाहिए, वे अपने हक के लिए सरकार और आयोग के खिलाफ प्रदर्शन करने को मजबूर हैं।
आयोग का यह दावा कि केवल गुणवत्ता और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए इस तरह के फैसले लिए जा रहे हैं, कहीं न कहीं छात्रों के साथ अन्याय है। आयोग अगर छात्रों के सुझावों को सुनकर, उनकी मांगों को समझकर कोई नीति बनाता, तो स्थिति इतनी गंभीर नहीं होती। छात्रों की मांगें कोई अतिशयोक्ति नहीं हैं, बल्कि वे अपने भविष्य के प्रति आशंकित हैं और चाहते हैं कि उन्हें निष्पक्षता मिले।
सरकार और आयोग को यह समझना चाहिए कि ये छात्र अपने जीवन का सबसे महत्वपूर्ण समय प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में लगाते हैं। जो युवा देश का भविष्य बनाने के लिए पढ़ाई में तल्लीन हैं, उन्हें अपने हक की लड़ाई लड़नी पड़ रही है। सरकार को चाहिए कि “नो नॉर्मलाइजेशन” नीति अपनाए और एक ही शिफ्ट में परीक्षा आयोजित कर छात्रों को राहत दे, ताकि वे बिना किसी भेदभाव के अपने उज्ज्वल भविष्य की ओर कदम बढ़ा सकें।
यह वक्त है कि आयोग को यह एहसास हो कि उनके फैसले छात्रों के करियर पर गहरा प्रभाव डाल सकते हैं, और इसीलिए छात्रों की मांगों पर गंभीरता से विचार करना जरूरी है।
…. लेखक– रवीश कुमार एडवोकेट