ट्रॉय शहर को दस वर्षों तक ग्रीक सेना हरा नहीं सकी। अंततः वे लकड़ी के एक घोड़े को युद्धभूमि में छोड़कर चले गए। शहरवासियों ने जीत की खुशी मनाई और उस घोड़े को शहर के भीतर लाकर चौराहे पर खड़ा कर दिया।
उन्हें क्या मालूम था कि उस घोड़े के भीतर ग्रीक सैनिक छिपे हुए हैं। रात होते ही वे बाहर निकले, शहर के द्वार खोल दिए। ग्रीक सेना भीतर आई और शहर पर कब्जा कर लिया।
सारा काम निकल जाने के बाद लकड़ी के उस घोड़े को जला दिया गया। नीतीश कुमार भी आज कुछ उसी अंतिम चरण में दिखाई देते हैं।
एक दौर में लालू, पासवान और दूसरे साथियों से राजनीतिक प्रतिस्पर्धा में पिछड़ चुके नीतीश ने अपनी प्रासंगिकता और सत्ता बचाए रखने के लिए बिहार की राजनीति में सांप्रदायिक राजनीति को अपना चेहरा और वकार सौंप दिया।
दरअसल बिहार में उन्होंने वही काम किया, जो जेपी आंदोलन ने पूरे भारत की राजनीति में किया।
हालाँकि जेपी आंदोलन केवल कांग्रेस विरोध नहीं था। वह भारतीय लोकतंत्र में एक नैतिक और वैचारिक हस्तक्षेप था। “संपूर्ण क्रांति” का विचार भ्रष्टाचार, केंद्रीकरण और सत्ता के दुरुपयोग के खिलाफ एक व्यापक राजनीतिक चेतना था।
अपने मूल स्वरूप में यह आंदोलन राजनीति को केवल सत्ता का खेल नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का माध्यम मानता था। लेकिन इस आंदोलन की एक बुनियादी विडंबना भी थी।
इसमे समाजवादी, गांधीवादी और वामपंथी विचारधारा के साथ-साथ जनसंघ के नेता भी शामिल थे।
गांधी हत्या के बाद जो सांप्रदायिक और नस्लवादी विचारधारा राजनीतिक रूप से अछूत और बदनाम हो चुकी थी। जेपी आंदोलन ने उसे मुख्यधारा की राजनीति में प्रवेश दिला दिया।
इसके बाद इन धाराओं के बीच सहयोग और राजनीतिक लेन-देन की एक परंपरा बन गई। नीतीश इसी राजनीतिक परंपरा की उपज हैं।
1990 के दशक में बिहार की राजनीति लालू प्रसाद यादव के प्रभुत्व में थी। उनकी राजनीति सामाजिक न्याय और पिछड़े वर्गों के सशक्तिकरण पर आधारित थी। चुनौती देने के लिए एक व्यापक राजनीतिक गठबंधन की आवश्यकता थी।
तोे पुराने समाजवादी जॉर्ज फर्नांडिस और नीतीश कुमार ने समता पार्टी के माध्यम से बीजेपी के साथ गठबंधन किया। यही गठबंधन आगे चलकर एनडीए की धुरी बना।
नीतीश कुमार के पास समाजवादी राजनीति की वैचारिक विरासत थी और बीजेपी के पास संगठनात्मक शक्ति। यह जुगलबंदी धीरे-धीरे सफल होती गई। 2005 में नीतीश के नेतृत्व में सरकार बनी, नीतीश कुमार को “सुशासन” की राजनीति का प्रतीक माना जाने लगा। सड़क निर्माण, कानून-व्यवस्था में सुधार, शिक्षा और महिला सशक्तिकरण की योजनाएँ लागू की गईं,लेकिन एक और प्रक्रिया भी चल रही थी।
बीजेपी, जो बिहार में सीमांत राजनीतिक शक्ति थी, नीतीश की भागीदारी मे अपनी सामाजिक और राजनीतिक पकड़ मजबूत करती चली गई।
गठबंधन सरकारों ने उसे शासन का अनुभव, संगठनात्मक विस्तार और राजनीतिक वैधता प्रदान की।
आगे के वर्षों में बार-बार बदलते गठबंधनों में भी नीतिश का लौट-लौटकर बीजेपी के पास जाना यह दिखाता है कि उनका राजनीतिक “कम्फर्ट ज़ोन” अन्य दलों की तुलना में बीजेपी के साथ अधिक रहा।
नीतीश की रणनीति थी कि वे बीजेपी के साथ गठबंधन करके भी अपनी वैचारिक पहचान बनाए रख सकते हैं। लेकिन दीर्घकालिक परिणाम अलग निकले।
बीजेपी, आज राज्य में केंद्रीय भूमिका निभा रही है। इस प्रकार जिस राजनीतिक व्यवस्था में बीजेपी एक सहयोगी के रूप में थी, वही व्यवस्था उसकी शक्ति विस्तार का मंच बन गई।
इस पूरी प्रक्रिया में सबसे बड़ा नुकसान बिहार की समाजवादी राजनीति को हुआ। राममनोहर लोहिया और जयप्रकाश नारायण की विचारधारा पर आधारित राजनीति कभी बिहार की मुख्यधारा हुआ करती थी।
वह छोटे-छोटे दलों में टूट गई। समाजवाद का स्थान चुनावी समीकरण और जातीय गठबंधनों ने ले लिया है। दूसरी ओर बीजेपी ने राष्ट्रवाद, कल्याणकारी योजनाओं और मजबूत संगठनात्मक ढाँचे के संयोजन से एक व्यापक सामाजिक गठबंधन तैयार कर लिया है।
परिणामस्वरूप बिहार की राजनीति का वैचारिक संतुलन पूरी तरह बदल चुका है।
नीतीश की विरासत अभी पूरी तरह तय नहीं हुई है,उन्होंने बिहार को स्थिरता और सकारात्मक बदलाव भी दिये। लेकिन तमाम सुशासन के तमगों के बावजूद इतिहास नेताओं को केवल उनके शासन से नहीं,बल्कि उनके राजनीतिक निर्णयों के दीर्घकालिक परिणामों से भी आंकता है।
इतिहास यह दर्ज करेगाा कि नीतीश कुमार का सबसे बड़ा असर उनकी सरकारें नहीं थीं, बल्कि वह राजनीतिक प्रक्रिया थी जिसके माध्यम से बिहार की राजनीति धीरे-धीरे सांप्रदायिक दलदल में बदल गई और यदि ऐसा हुआ, तो इतिहास उन्हें उसी रूपक से याद करेगा “बिहार का ट्रोजन हॉर्स’’।
गर्भ मे सांप्रदायिकता को पालते हुए, अपनी सत्ता को लंबा करने की राजनीति से नीतिश ने अपशकुनी सामाजिक समीकरण बोया। उसकी फसल लहलहा रही है।
जब इतिहास की यह कथा जल्द पूरी होगी। और तब बिहार का ट्रोजन हॉर्स, मुंह पर समाजवाद की राख मले,राज्यसभा की तलहटी मे पड़ा होगा।
(लेखक- रेबार्न मनीष)











