हम एक ही थे
उस अँधेरे कमरे मे
ज़ब सोते से तुम्हें जगाया था।
हम एक ही थे
ज़ब आधा पराठा
तुमने मेरी तरफ बढ़ाया था।
हम एक ही थे
ज़ब दुनिया से टकराये थे
हम एक ही थे
ज़ब किसी जाते हुए
को तुमसे विदा कराया था।
एक ही तब भी थे
ज़ब चिता पर लकड़ी दे रहे थे
एक ही तब भी थे
ज़ब तर्पण कि अग्नि और श्लोकों
मे तुम्हारी आँखें धुंधलाई थीं
तुम अलग कब हो पाओगे?
हाँ अलग होंगे
उस रोज….. ज़ब मुझे दे रहे होगे विदाई
किसी अँधेरे कमरे मे सबसे दूर
अपने आँसू को बहते ज़ब देखोगे
हम तब अलग होंगे
तब तक….. हम एक ही हैं।
लेखिका- मनस्वी शिल्पी