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Saturday, August 13, 2022
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Press Day: हिन्दी पत्रकारिता दिवस विशेष

Press Day: 30मई 1826 को कोलकाता से उद्धन्त मार्तण्ड नामक एक हिंदी साप्ताहिक अखबार को पंडित जुगल किशोर शुक्ल  ने आज के ही दिन प्रकाशित किया था।

स्वस्थ लोकतंत्र को जिन्दा रखने के लिए जिन संसाधनों की जरुरत है उसमें से पत्रकारिता को हटा दिया जाय तो लोकतंत्र अराजकता का इतिहास लिखने में गुरेज नहीं करेगा? देश की आन्तरिक ब्यवस्था से लेकर‌ बाहरी ब्यवस्था आस्था की टकराहट में चरमरा उठेगा! गुलाम भारत में जब आज़ादी सिसक रही थी लोकतन्त्र पैदा नहीं हुआ था पत्रकार शब्द ही विलोपित था आदमी भेड़-बकरी सरीखे राजसत्ता‌ के कानून में बे मौत मर रहे थे न कोई अवरोध न कोई विरोध न कोई आचार न बिचार राजसत्ता से जो आदेश निकला सबको स्वीकार?

उद्धन्त मार्तण्ड साप्ताहिक हिंदी अखबार से हुई शुरुआत

30मई 1826 को कोलकाता से उद्धन्त मार्तण्ड नामक एक साप्ताहिक अखबार को पंडित जुगल किशोर शुक्ल जी ने पहला हिन्दी अखबार प्रकाशित किया जो हर मंगलवार को प्रकाशित होता था! उस समय कोलकाता गुलाम भारत की राजधानी हुआ करता था। पहला अखबार आने वाले स्वतन्त्र भारत के लोकतन्त्र का प्रस्तावना लिखता रहा—–?पत्रकारिता की नींव दुर्व्यवस्था के माहौल में रख कर शुक्ल जी ने पत्रकारिता के आधुनिक आयाम को विस्तारित करने का सूत्र देश के नौजवानों बुद्धजिवियो को समर्पित कर दिया! देश की आजादी में अहम किरदार निभाने वाले कलमकार अखबार आजाद भारत के लहुलूहान धरती पर अपने जीवन को समर्पित कर स्वस्थ लोकतंत्र के प्रतिस्थापना में अहम किरदार निभाने लगे! आज लोकतन्त्र के चौथे स्तम्भ का जबानी खिताब लेकर समाज की मूल भूत आवश्यकताओं में हो रही सरकारी सेध मारी की लाईलाज बिमारी की दवा पत्रकार निस्वार्थ भाव से कर रहा है।हालांकि आजादी के सात दशक गुजरते गुजरते लोकतन्त्र को समर्पित सभी लोक संचालन के लिये बनाए गया नियम कानून संक्रमित हो गया है? ऐसे में पत्रकार समाज में भी गिरावट लाजमि है! जैसा वातावरण वैसा ही सम्वरण करता आदमी है।फिर हाल सम्बृध समाज में आज भी पत्रकार शब्द अपने आप में अलग महत्व रखता है! लाख प्रदुषित समाज हो गया फिर भी इस समाज में पत्रकार अलग दिखता है।कभी पत्रकारिता जनहित के लिए समर्पित हुआ करती थी! मगर समय के साथ जबसे अखबार पूजी पतियों के हाथ में चला गया अब पत्रकारिता जनहित के लिए मिशन नहीं कमीशन का खेल हो गया?।अखबार ब्यवसाईक हो गये पत्रकार बिकाऊ हो गये? समाचार उबाऊ हो गये?सच के सतह पर झूठ की खेती अगेती फसल के तरह भ्रष्टाचार का खाद-पानी पाकर लहलहा रही है।बदलते परिवेश में बिशेष बदलाव जो आज दिख रहा है उसमें शिक्षा, न दीक्षा, न परीक्षा, हर मामले की जगह जगह हो रही है समीक्षा! सोसल मिडिया का प्लेट फार्म उफान पर है! इलेक्ट्रॉनिक चैनल” यू ट्यूब चैनल’ सहित तमाम तरह के संसाधन जागरुक समाज में आज चर्चा का विषय बन गये है।

प्रिंट मीडिया के कमजोर होने से गिर रहा पत्रकारिता का स्तर

प्रिंट मीडिया विलोपित हो रही है! खोजी पत्रकारिता प्रदुषित हो रही है! रोजी रोटी के लिये आधुनिक जमाने की सोशल मीडिया अपने आप खुद से अधिकृत होती जा रही है।? जिसका नतीजा है पत्रकार समाज की मर्यादा धूल धूसरित हो रही है। सच्चाई झूठ की रहनुमाई में नाजायज कमाई के लिये सोशल प्लेटफार्म हर जगह जग हंसाई करा रहा है। परिवर्तन के समर्थन में नर्तन करती आधुनिकता पुरातन संस्कृति के शानिध्य में लयबद्ध कलम की सच्ची ईबारत पर ग्रहण बनकर पुष्पित पल्लवित हो रही है।जब तक सच छप कर आयेगा तब तक झूठ का हल्ला डंका बजा दे रहा है।।आज यही कारण है की पत्रकार समाज जगह जगह अपनी अस्मिता खो रहा है!जेल की रोटी खा रहा है! पूरा परिवार रो रहा है! कहां भी गया है जब सौ झुट्ठे इकट्ठा हो जाये तो एक सच्चा टूट जाता है। लोकतन्त्र के स्वतन्त्र आवरण में जिस तरह पत्रकार समाज का चीरहरण हो रहा हैअगर रक्तबीज के तरह बढ़ रहे इन स्वयं भू प्रकट हो रहे पत्रकारों के उत्पादन पर रोक नहीं लगा तो स्वस्थ समाज इनके कारनामों से कलंकित होकर भ्रमित हो जायेगा?।सच लिखने वाला खुद को असहाय कमजोर समझ कर लेखनी को न चाहते हुये भी प्रश्न काल में अवक्षेपित करने को बाध्य हो जायेगा।? सरकार को निराकार ब्रह्म की तरह अवतरित आधुनिक पत्रकारों के लिये एक निश्चित माप दण्ड का सिमाई निर्धारण जरूर करना चाहीए !ताकि आने वाले कल में स्वस्थ समाज में सच की इबारत को प्रमुखता से प्रकाशित करने के लिए जद्दोजेहाद का सामना सच्चे पत्रकार को न करना पड़े।? वक्त के साथ सब कुछ बदल जाता है यही सच है! फिर भी समदर्शिता ‘आदर्शवादिता’ के साथ ही कलमकार की ईबारत में पारदर्शिता आवश्यक है।हम सुधरेंगे जग सुधरेगा?

आसिफ खान (प्रदेश महामंत्री- राष्ट्रीय पत्रकार संघ)

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