जिला ब्यूरो /मनोज सिंह
टीकमगढ़। मछुआरों की आय बढ़ाने और उनके विकास के लिए चलाई जा रही मुख्यमंत्री मछुआ समृद्धि योजना पर अब गंभीर सवाल उठ रहे हैं। सूत्रों से मिली जानकारी और उपलब्ध दस्तावेज़ों के अनुसार, मत्स्य विभाग टीकमगढ़ में आवंटित करोड़ों रुपए के खर्च में भारी अनियमितताएं सामने आई हैं। आरोप है कि जिन तालाबों में फरवरी–मार्च आते ही पानी सूख जाता है, वहां भी कागज़ों पर लाखों रुपए का मछली बीज और झींगा डाले जाने का उल्लेख है। इतना ही नहीं, बिना जीएसटी नंबर और बिना लाइसेंसधारी विक्रेताओं के नाम से करोड़ों रुपए के खाद–उर्वरक के बिल पास कर लिए गए।
सूखे तालाबों में मछलियां और झींगे?
सूत्रों के अनुसार, जिले के कई तालाब गर्मियों में पूरी तरह सूख जाते हैं या नाम मात्र का पानी बचता है। इन हालात में मछली या झींगा डालना संभव ही नहीं। इसके बावजूद विभागीय कागज़ों में लाखों रुपए का मछली बीज और चारा (उर्वरक) डाल दिए जाने का उल्लेख है। सवाल उठ रहा है –
जब तालाब सूखे पड़े थे, तब आखिर मछली और झींगा कहां डाले गए? क्या कागज़ों पर ही मछलियां पालने का खेल हुआ?
जीएसटी रहित और फर्जी बिलों का खेल
सूत्र बताते हैं कि मत्स्य विभाग में जिन बिलों पर भुगतान किया गया, उनमें न तो जीएसटी नंबर है और न ही कृषि विभाग से लाइसेंसधारी विक्रेताओं का कोई नाम। यहां तक कि कुछ दुकानों का अस्तित्व तक संदिग्ध बताया जा रहा है। कंप्यूटराइज तरीके से मनमाने रेट पर तैयार किए गए इन बिलों में मूल्य का भी कोई स्पष्ट मापदंड नहीं है।
करोड़ों की राशि, मगर जमीन पर काम शून्य
वित्तीय वर्ष 2024-25 में टीकमगढ़ जिले को लगभग 32 लाख रुपए मछली–झींगा संवर्धन, 20 लाख रुपए स्मार्ट फिश पार्लर और लाखों रुपए प्रशिक्षण के लिए मिले। निवाड़ी जिले को भी झींगा पालन और फिश पार्लर के लिए करोड़ों की राशि दी गई। लेकिन जमीनी स्तर पर न तो फिश पार्लर दिखाई देते हैं, न ही मछुआरों का कोई ठोस प्रशिक्षण हुआ है।
मुख्यमंत्री की मंशा पर सवाल
मुख्यमंत्री मोहन यादव की इस योजना का उद्देश्य स्पष्ट था मछुआरों की आमदनी बढ़ाना और उन्हें आर्थिक रूप से मजबूत करना। लेकिन सवाल यह है कि जब सूखे तालाबों में ही मछलियां और झींगे पाल दिए गए दिखाए गए, तो क्या यह योजना मछुआरों तक पहुंच रही है या फिर केवल विभागीय फाइलों और बिलों में ही सीमित रह गई है?
जांच की मांग तेज
पूरा मामला अब जांच का विषय बन गया है। कई संगठनों और मछुआ समाज से जुड़े लोगों का कहना है कि अगर स्वतंत्र एजेंसी या उच्चस्तरीय जांच टीम इस पूरे प्रकरण की छानबीन करे, तो करोड़ों रुपए के गबन और अनियमितताओं का राज़ खुल सकता है।