ब्यूरोरपोर्ट-
टीकमगढ़। सरकार की महत्वाकांक्षी मुख्यमंत्री मछुआ समृद्धि योजना का मकसद गरीब मछुआरों को आत्मनिर्भर बनाना है, लेकिन टीकमगढ़ का मत्स्य विभाग इस योजना को अपनी कमाई का जरिया बना चुका है। विभागीय भ्रष्टाचार का ऐसा घिनौना चेहरा सामने आया है, जिसने व्यवस्था की पोल खोल दी है।
ग्राम करमारई निवासी श्यामलाल रैकवार ने कलेक्टर को दिए लिखित आवेदन में जिला मत्स्य अधिकारी श्रीमती मेघा गुप्ता पर गंभीर आरोप लगाए हैं। आवेदन में बताया गया कि श्यामलाल पिछले कई सालों से झींगा पालन हेतु सब्सिडी के लिए विभाग के चक्कर काट रहे हैं, लेकिन हर बार उन्हें टाल दिया गया।
जब वे सीधे जिला मत्स्य अधिकारी से मिले तो उन्हें साफ शब्दों में कहा गया कि—
यदि सब्सिडी का लाभ चाहिए तो जो भी राशि आपके समूह खाते में आएगी, उसका 50 प्रतिशत हिस्सा हमें कमीशन के रूप में देना होगा। इसमें से 10 प्रतिशत अग्रिम देना अनिवार्य है।
श्यामलाल के अनुसार जब उन्होंने रिश्वत देने से इनकार किया, तो अधिकारी ने उन्हें अपमानित करते हुए कहा – तुम यहाँ क्या करने आए हो, जाओ बाहर! इतना ही नहीं, उनके साथ आए समूह के सदस्यों को भी दफ्तर से जबरन बाहर निकाल दिया गया।
इस पूरे घटनाक्रम से यह स्पष्ट है कि योजना के नाम पर गरीब हितग्राहियों की बेइज्जती और शोषण किया जा रहा है।
गंभीर मांगें उठीं – कलेक्टर से न्याय की गुहार
प्रकरण की निष्पक्ष जांच कराई जाए। दोषी अधिकारी के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाए। वास्तविक हितग्राहियों को बिना रिश्वत दिए योजना का लाभ मिले, अन्य लाभार्थियों से भी फीडबैक लेकर विभाग की कार्यप्रणाली की समीक्षा हो।
श्यामलाल ने इस आवेदन की प्रतिलिपि मुख्य कार्यपालन अधिकारी जिला पंचायत टीकमगढ़, उपसंचालक मत्स्य विभाग सागर और संचालक मत्स्य विभाग भोपाल सहित उच्च अधिकारियों को भेजी है।
सरकार के लिए चुनौती, विभाग की साख दांव पर
यह मामला सिर्फ एक हितग्राही का नहीं, बल्कि पूरे मछुआ वर्ग की पीड़ा है। सवाल यह है कि जब गरीब किसानों और मछुआरों को मिलने वाली योजनाओं पर ही अफसर कमीशनखोरी का जाल बुन लेंगे, तो योजनाओं का असली फायदा आखिर किसे मिलेगा?
प्रदेश की सरकार जहां योजनाओं को गरीबों की ताकत बताती है, वहीं विभागीय अफसर उन्हीं योजनाओं को अपनी निजी तिजोरी भरने का साधन बना रहे हैं। अब देखना है कि कलेक्टर इस गंभीर मामले पर कितनी कठोर और पारदर्शी कार्रवाई करते हैं।