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Monday, August 15, 2022
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अमृत महोत्सव (Amrit Mahotsav) का बाजारीकरण

भारत को स्वतंत्रता मिलने के बाद से ही हर स्वतन्त्रता दिवस पर सब लोग अपनी अपनी श्रद्धा और क्षमता और हैसियत अनुसार, धर्म -जाति से ऊपर उठकर अपने घरों ,दफ्तरों, दुकानों ,संस्थानों वाहनों पर उमंग और उत्साह से बिना किसी दबाब के या प्रचार के राष्ट्रध्वज फहराते थे और अपनी अपनी तरह उत्सव मनाते थे। सिर्फ़ सरकारी कर्मचारियों पर ज़रुर स्वतंत्रता दिवस में भाग लेने की अनिवार्यता लागू होती थी।लेकिन जनसाधारण कोई किसी मजबूरी में ध्वज नहीं लगा पाया तो उसका अर्थ राष्ट्रप्रेम का अभाव नहीं माना जाता था। अब सरकारी अमला अमृत महोत्सव के नाम पर तिरंगा की जिस अनिवार्यता का प्रचार कर रही है उसे देशप्रेम कहें या कट्टरपंथीदेशप्रेम कहें। इन दोनों में थोड़ा अन्तर है। राष्ट्रप्रेम और राष्ट्र उन्माद में जो अन्तर है उसको समझना ज़रुरी है।

लेखक- उदयप्रताप सिंह (पूर्व सांसद,लेखक,कवि, पूर्व अध्यक्ष हिंदी संस्थान)

देशप्रेम एक स्वाभाविक मनोवृति है। हम जिस कक्ष, मकान,गांव, में रहते हैं उससे अटूट प्रेम हो जाता है उसी क्रम में देशप्रेम भी स्वाभाविक होता है। कुदरती।लेकिन कट्टरपंथी देशप्रेम या उसका उन्माद एक साधना मात्र होता है स्वंय में साध्य नहीं होताहै। निहित साध्य कोई निहित स्वार्थ होता है जैसे आत्मप्रचार।
आज बीजेपी की वर्तमान सरकार जो अभूतपूर्व संकट से गुज़र रही हैं। समाज का हर वर्ग महंगाई,गरीबी,बेकारी, बीमारी, भ्र्ष्टाचार, और सरकार की असमंजस की स्थित से त्रस्त है।सरकार बिल्कुल किंकर्तव्यविमूढ़ है। रुपये की क़ीमत दिन बदिन डालर की तुलना में घट रही है
हमारी विकास दर ऋणात्मक है। किसान, मजदूर, छोटाव्यापरी, नौकरीपेशा सब असमंजस में हैं कि विरोध कैसे करें।नोटबन्दी,जीएसटी से लेकर सारे अबतक के सारे कृषक, श्रमिक,नागरिकता कानून विवादस्पद रहे हैं। किसानों का मसला फिर से दिन पर दिन बाद से बदतर हो रहा हैं। सरहद पर स्थितियां समान्य नहीं दिखती है।
इसलिए कभी कभी-कभी चुनाव पूर्व साम्प्रदायिकता और धार्मिक ध्रुवीकरण का हथकंडा प्रयुक्त करना की जैसी विवशता उनकी बीजेपी की पहले से अबतक दरपेश आती रही है जिससे तमाम नाकामियों के बाबजूद उनकी चुनाव वैतरनी पार हो जाती रहीहै।
उसी तरह जब हम सब राष्ट्रध्वज की महत्ता को 75 साल से स्वीकारते रहे हैं तब उसके प्रचार-प्रसार में गरीब मुल्क में अनाप-शनाप हजारों करोड़ रुपये का व्यय करके उसकी अनिवार्यता को देशभक्ति में जोड़ने के जुनून से नीयत पर संदेह होता है। अमृत महोत्सव (Amrit Mahotsav) का नामकरण करने से उस पर एक पार्टी का एकाधिकार नहीं होगया है। स्वतंत्रता संग्राम में जिनका योगदान नहीं था या कम था वे लोग शहीदों के परिवारों को आजादी के साल होने पर उत्सव मनाने की सलाह दें और वे जिन्होंने शुरू से राष्ट्रध्वज को 2002 तक मान्यता नहीं दी वे हमें राष्ट्रध्वज का महत्व सुझाएं अपनी जनअहितकारी नाकामियों के चलते तब समझ आ जाता है यह भी कहीं अमृत महोत्सव का बाजारीकरण तो नहीं होगया या हो रहा है ?
जयहिंद

(यह लेख लेखक की फेसबुक वॉल से लिया गया है)

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